Sahitya Ke Sarokar (Hindi Edition) baixar

Sahitya Ke Sarokar (Hindi Edition) pdf

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Descrição do livro

साहित्य के सरोकार - लेखक का सरोकार लेखक को अपने प्रति, अपने भीतर के मनुष्य के प्रति तो है, पर उसके बारे में प्रश्न करने वाला भी भीतर का ही आदमी होगा, जो मेरे मन की आवाज़ को सुन नहीं सकता वह आदमी क्यों मुझसे प्रश्न करे? मेरे लिखने का स्रोत बाहर तो है नहीं, भीतर है। इसीलिए मेरी दृष्टि में सरोकार से अधिक साहित्य का रिश्ता चिन्ता से है। साहित्य भीतर की बेचैनी से ही उकसता है। उसी तरह जैसे कि बीज धरती में डाला जाता है और थोड़ी ऊष्मा से तपता है तो अँखुआ बन जाता है। यदि ठण्डे स्थान में रहता है तो वह बीज ही बना रहता है। कालिदास ने इसी व्यापार को पर्युत्सुकी भाव कहा है जो उत्सुक नहीं है, उत्कण्ठित नहीं है, चैन से उसको किसी अनजानी, अनहोनी चिन्ता से किसी अप्रत्यक्ष दिशा की ओर आकुल कर देने वाला व्यापार ही पर्युत्सुकी भाव है। यही साहित्य का धर्म है। जहाँ कोई हो, वहाँ से उसका विस्थापित होना, चाहे थोड़े ही समय के लिए क्यों न हो, साहित्य के प्रभाव का सबसे सटीक प्रमाण है। पर यह बेचैनी देश और काल की सीमाओं कों लाँघ करके होती है।

★★★

साहित्य की एक भूमिका बड़ी जबरदस्त है। वह जनतन्त्र की भावना को जगाये रखता है, क्योंकि साहित्य का प्राण है असहमति। बाणभट्ट ने ‘हर्षचरित’ लिखा, हर्ष आश्रयदाता थे; लेकिन उसमें जहाँ वह प्रसंग आता है जहाँ हर्ष की सेना राज्यश्री को ढूँढ़ने और मौखरि राजधानी पर आक्रमण करने वाली सेना का पीछा करने निकली है। वहाँ पर बाणभट्ट का चित्त उद्विग्न हो जाता है, क्योंकि सेना विंध्य के उपान्त ग्रामों की फ़सल कुचलती हुई जा रही है। उनका उद्वेग कई रूपों में प्रकट होता है। बच्चे दूर से सैनिकों को चिढ़ाकर भाग रहे हैं। एक अध्यापक निर्भय होकर सामने आता है - कैसा राजा, जिसकी सेना किसानों की फ़सल बरबाद कर रही है। सबसे करुण प्रसंग तब आता है जब कुछ ख़रगोश झाड़ियों से प्रयाण करती हुई सेना की पगचाप सुन कुतूहलवश बाहर निकलते हैं और सैनिकों के पदत्राणों से कुचले जाकर चिन्दी-चिन्दी-बिखर जाते हैं। इस निर्ममता का बहुत ही द्रावक वर्णन बाणभट्ट ने किया है। मुझे ऐसा लगता है कि ‘हर्षचरित’ को इसीलिए बाणभट्ट ने अधूरा छोड़ दिया था। सम्भवतः राज्याश्रय को भी इसीलिए वे आगे सहन नहीं कर पाये। रीतिकाल के भी बहुत सारे कवि हैं, जो राज्याश्रय में रहकर भी राज्याश्रय को ठुकराते रहे। साहित्यकार किसी का मनसबदार बनकर रहना नहीं गवारा कर सकता। वह इसलिए जनतन्त्र में एक कारक घटक बनता है, प्रतिरोध की शक्ति देता है-सत्ता के प्रतिरोध की शक्ति; साहस के साथ खड़े होने का निर्भय भाव देता है।

Número de páginas :187
Acabamento Sahitya Ke Sarokar (Hindi Edition):Kindle
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